माँ एक अप्रत्यक्ष कृपादान।

माँ एक अप्रत्यक्ष कृपादान।
जन्मदात्री के नयनों से करता है बालक इस दुनिया के दीदार।
जहाँ एक और है इतना छल, वहीं निश्छल प्रेम की मूर्त है माँ।
बच्चे के दु:ख में रोती,  बच्चे के सुख में हँसती
बनती उसका एकमात्र सहारा, जब कोई नहीं उसको भाता।
स्वर्ग से निराला है माता का अँचल
हैं अति बड़भागी जिन्हें प्राप्त है माँ का प्यार
वरना कुछ अभागे हैं इससे वंचित।
जिसके गुस्से में भी है स्नेह झलकता
जिसे अपने बच्चे से प्यारा कुछ नहीं
उस माँ को भूल कर भी मत करना दु:खी
वरना कभी नहीं रहोगे सुखी।
माँ एक अप्रत्यक्ष कृपादान।

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